टेंशन में भगवान
टेंशन में भगवान
लंबे समय से कोई भक्त मंदिर नहीं आया। जो पंडित पूजारी था वह भी लॉकडाउन की वजह से गांव चला गया। मंदिर में इधर उधर जो थोड़ा बहुत प्रसाद बिखरा था उसे पक्षी और स्वान चट कर गए। अब मंदिर में मंदिर वाली महक भी नहीं आ रही।
सुबह से शाम तक अनेक महिलाएं घर परिवार की बतियाने चली आती थी, उनके साथ मेरा भी टाइम पास हो जाता था। मगर कई दिनों से किसी भी भक्त के चरण मंदिर की पौडिय़ों पर नहीं पड़े। दूर- दूर तक कोई दिखाई भी नहीं पड़ रहा। क्या वक्त आ गया है। कोई कुछ मांगने नहीं आ रहा है। लगता है सब के सब संपूर्ण हो गए हैं। किसी को किसी चीज़ जरूरत नहीं रही। अगर ऐसा हुआ तो तेरा क्या होगा कालिया?
भगवान जी जोर से बोलने लगेे-अरे कठोर उपासको, कहां छुप गये तुम लोग। तुम्हारा चाहने वाला भगवन पल-पल भटक रहा है। तुम्हारी राह तकते-तकते आंखें पथरा गई हैं मेरी। अरे नासमझो, कुछ समझो, तुम्हारे बिना मेरा क्या जीना। मेरी तो हैसियत ही तुुम्हारी खैरियत पर टिकी है।
अरे ओ पुजारी। तेरा ये प्यार का सागर सूखने पर आ गया है। कहां है तूं और कहां है तेरा जल वाला लोटा। अरे निर्दयी तूं आ जा और मेरे सिर पर जल चढ़ा जा। मेरा शरीर तपने लगा है। बड़े जोर की प्यास लगी है। सामने एक टोंटी से पानी टिप-टिप की आवाज़ कर रहा है। शायद वह मेरा मजाक उड़ा रहा है।
मेरी चोटी से गंगा निकलती है, मैंने यह कभी नहीं कहा। यह तो तुम्हारी मान्यता है।
अरे भोले मानुष, तूं है तो चोटी से गंगा क्या, ब्रह्मपुत्र भी निकल जाएगी। तूं नहीं तो एक बूंद भी निकलने वाली नहीं है। आजा कठोर, तूं कहां छुप गया, आजा। मुझे तो स्नान किए भी डेढ़ माह होने को है। और तुझे तो पता है बिना नहाए मैं किसी का भोग स्वीकार नहीं करता। वक्त का झोल देखिए, धूल रमाने पर विवश हो गया हूं। तूं कब तक और इंतजार कराएगा। मेरी दुनिया वीरान है तेरे बिना।
ये देख, पेड़ पौधों के पत्ते मुझसे अटखेलियां कर रहे हैं। तेरा आना-जाना लगा था तो इनका यहां क्या काम था। साफ सफाई का पूरा ख्याल रखा जाता था। घर में चाहे कोई झाड़ू न लगाता हो लेकिन मेरे आंगन में अवश्य सफाई करता था। अब इन पत्तों ने मेरे आंगन को सराय बना लिया है।
ये हवा भी बड़ी बेशर्म है। इसको कोई लिहाज नहीं है। बिना रुके सारा दिन दौड़ती रहती है। यहां धूल बिखेर देती है, फूल कभी नहीं लाती, जेसे तुम लोग ले आते थे। कभी ठहरकर हाल-चाल भी नहीं पूछती। शायद उसको फुर्सत नहीं है। उसके बारे में क्या कहूं। लगता है हवा को भी किसी की हवा लग गई है।
भगवान जी बोले जा रहे थे।
मेरे प्यारे भक्तजनों, मंदिर के रोशनदानों में बैठने वाले कबूतरों की संख्या बढ़ती जा रही है। मुझे शिकायत उनकी बढ़ती संख्या से नहीं है, मुझे परेशानी उनकी गुटर-गुटर से है। अगर यह गुटर-गुटर ज्यादा हो गई तो कहीं आप लोग मुझे भूलकर अटरिया पे लौटन कबूतर वाला गाना न गाने लग जाएं।
लॉकडाउन फेस तीन शुरू हो गया लेकिन मंदिर के कपाट खोलने की अनुमति उसमें भी नहीं मिली।
मंदिर की घंटियां बजे अर्सा हो चला है।
भगवान जी बोले- जब तक घंटियां नहीं बजती तब तक मंदिर का माहौल भक्तिमय नहीं होता। मुझमें और भक्तजनों में अलौकिक आनंद की अनुभूति तभी होती है जब घंटियों के साथ आरती का स्वर गुंजायमान होता है। सारे देवी देवता आरती समारोह में भाग लेने के लिए दौड़े चले आते हैं। जिसके भी कानों को वह संगीत स्वर सुनाई पड़ता है वह भक्ति सागर की लहरों पर तैरने लगता है। आस्था के समुद्र में डूबकी लगाता है तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता स्वत: विकसित हो जाती है।
भक्तजनों में दान दक्षिणा की इच्छाशक्ति भी तभी बलवान होती है।
भगवान जी बोले- यह ठीक है कि दान दक्षिणा से मेरा सीधे-सीधे कोई लेना देना नहीं है, लेकिन दान दक्षिणा से ही तो मंदिरों का निर्माण होता है। मंदिर होंगे तो आस्था होगी। आस्था होगी तो तूं होगा, और तूं होगा तो मैं हूंगा। तो हे इंसान, तूं जल्द लौट के आ, और मंदिर की घंटी बजा।
तुम्हारी प्रतिक्षा में
भगवन
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लंबे समय से कोई भक्त मंदिर नहीं आया। जो पंडित पूजारी था वह भी लॉकडाउन की वजह से गांव चला गया। मंदिर में इधर उधर जो थोड़ा बहुत प्रसाद बिखरा था उसे पक्षी और स्वान चट कर गए। अब मंदिर में मंदिर वाली महक भी नहीं आ रही।
सुबह से शाम तक अनेक महिलाएं घर परिवार की बतियाने चली आती थी, उनके साथ मेरा भी टाइम पास हो जाता था। मगर कई दिनों से किसी भी भक्त के चरण मंदिर की पौडिय़ों पर नहीं पड़े। दूर- दूर तक कोई दिखाई भी नहीं पड़ रहा। क्या वक्त आ गया है। कोई कुछ मांगने नहीं आ रहा है। लगता है सब के सब संपूर्ण हो गए हैं। किसी को किसी चीज़ जरूरत नहीं रही। अगर ऐसा हुआ तो तेरा क्या होगा कालिया?
भगवान जी जोर से बोलने लगेे-अरे कठोर उपासको, कहां छुप गये तुम लोग। तुम्हारा चाहने वाला भगवन पल-पल भटक रहा है। तुम्हारी राह तकते-तकते आंखें पथरा गई हैं मेरी। अरे नासमझो, कुछ समझो, तुम्हारे बिना मेरा क्या जीना। मेरी तो हैसियत ही तुुम्हारी खैरियत पर टिकी है।
अरे ओ पुजारी। तेरा ये प्यार का सागर सूखने पर आ गया है। कहां है तूं और कहां है तेरा जल वाला लोटा। अरे निर्दयी तूं आ जा और मेरे सिर पर जल चढ़ा जा। मेरा शरीर तपने लगा है। बड़े जोर की प्यास लगी है। सामने एक टोंटी से पानी टिप-टिप की आवाज़ कर रहा है। शायद वह मेरा मजाक उड़ा रहा है।
मेरी चोटी से गंगा निकलती है, मैंने यह कभी नहीं कहा। यह तो तुम्हारी मान्यता है।
अरे भोले मानुष, तूं है तो चोटी से गंगा क्या, ब्रह्मपुत्र भी निकल जाएगी। तूं नहीं तो एक बूंद भी निकलने वाली नहीं है। आजा कठोर, तूं कहां छुप गया, आजा। मुझे तो स्नान किए भी डेढ़ माह होने को है। और तुझे तो पता है बिना नहाए मैं किसी का भोग स्वीकार नहीं करता। वक्त का झोल देखिए, धूल रमाने पर विवश हो गया हूं। तूं कब तक और इंतजार कराएगा। मेरी दुनिया वीरान है तेरे बिना।
ये देख, पेड़ पौधों के पत्ते मुझसे अटखेलियां कर रहे हैं। तेरा आना-जाना लगा था तो इनका यहां क्या काम था। साफ सफाई का पूरा ख्याल रखा जाता था। घर में चाहे कोई झाड़ू न लगाता हो लेकिन मेरे आंगन में अवश्य सफाई करता था। अब इन पत्तों ने मेरे आंगन को सराय बना लिया है।
ये हवा भी बड़ी बेशर्म है। इसको कोई लिहाज नहीं है। बिना रुके सारा दिन दौड़ती रहती है। यहां धूल बिखेर देती है, फूल कभी नहीं लाती, जेसे तुम लोग ले आते थे। कभी ठहरकर हाल-चाल भी नहीं पूछती। शायद उसको फुर्सत नहीं है। उसके बारे में क्या कहूं। लगता है हवा को भी किसी की हवा लग गई है।
भगवान जी बोले जा रहे थे।
मेरे प्यारे भक्तजनों, मंदिर के रोशनदानों में बैठने वाले कबूतरों की संख्या बढ़ती जा रही है। मुझे शिकायत उनकी बढ़ती संख्या से नहीं है, मुझे परेशानी उनकी गुटर-गुटर से है। अगर यह गुटर-गुटर ज्यादा हो गई तो कहीं आप लोग मुझे भूलकर अटरिया पे लौटन कबूतर वाला गाना न गाने लग जाएं।
लॉकडाउन फेस तीन शुरू हो गया लेकिन मंदिर के कपाट खोलने की अनुमति उसमें भी नहीं मिली।
मंदिर की घंटियां बजे अर्सा हो चला है।
भगवान जी बोले- जब तक घंटियां नहीं बजती तब तक मंदिर का माहौल भक्तिमय नहीं होता। मुझमें और भक्तजनों में अलौकिक आनंद की अनुभूति तभी होती है जब घंटियों के साथ आरती का स्वर गुंजायमान होता है। सारे देवी देवता आरती समारोह में भाग लेने के लिए दौड़े चले आते हैं। जिसके भी कानों को वह संगीत स्वर सुनाई पड़ता है वह भक्ति सागर की लहरों पर तैरने लगता है। आस्था के समुद्र में डूबकी लगाता है तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता स्वत: विकसित हो जाती है।
भक्तजनों में दान दक्षिणा की इच्छाशक्ति भी तभी बलवान होती है।
भगवान जी बोले- यह ठीक है कि दान दक्षिणा से मेरा सीधे-सीधे कोई लेना देना नहीं है, लेकिन दान दक्षिणा से ही तो मंदिरों का निर्माण होता है। मंदिर होंगे तो आस्था होगी। आस्था होगी तो तूं होगा, और तूं होगा तो मैं हूंगा। तो हे इंसान, तूं जल्द लौट के आ, और मंदिर की घंटी बजा।
तुम्हारी प्रतिक्षा में
भगवन
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