कोरोनिल को घर में घुसकर मारा
कोरोनिल को घर में घुसकर मारा
आयुर्वेद का जनक भारत। बावजूद इसके आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल पर इतनी जबरदस्त सर्जिकल स्ट्राइक हुई है कि आचार्य बालकृष्ण को प्रेस कांफ्रेंस में हाथ जोडक़र कहना पड़ा कि उन्होंने कोरोना की कोई दवा नहीं बनाई। आयुर्वेदिक दवा जरूर बनाई है जिससे कोरोना के मरीज ठीक हुए हैं।
दवा का नाम कोरोनिल हो या कोरोनावटी, है तो कोरोना की दवा ही। इसमें इधर-उधर की बात करने से क्या फायदा। उनको अपनी बात पर अडिग रहना चाहिए था कि हां, उन्होंने जयपुर की मेडिकल यूनिवर्सिटी से मिलकर कोरोना की दवा बनाई है। अब किसी को खानी है तो खाइये, जबरदस्ती थोड़ा है। किसी को असर हो, किसी को ना हो। ये कोई जरूरी थोड़े है पैरासीटामोल से सभी का बुखार उतर जाता हो।
कोई भी डाक्टर या दवा किसी मरीज को ठीक करने की गारंटी नहीं देते। डाक्टर व दवा अपना-अपना प्रयास करते हैं। ठीक तो मरीज को स्वयं होना होता है। यह नीति कोई कोरोना के मरीज पर लागू नहीं होती बल्कि हर प्रकार के मरीज पर लागू होती है।
बाजार में खांसी की अनेक प्रकार की दवाइयां बिक रही हैं। अनेक कंपनियां बना रही हैं। किसी को कोई दवा असर कर जाए तो किसी को कोई दवा असर न करे। इसमें दवा की गलती थोड़े है। यह तो रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर करता है।
तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा ये सब जड़ी बूटियां हैं। इनको खा भी लिया जाए तो क्या आसमान टूट जाएगा। इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। एक बार आजमा कर देख लिया जाए तो क्या आफत है। देश में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री भी तो आजमाकर देखे जाते रहे हैं।
आयुर्वेद तो वैसे भी कुदरत का तोहफा है, सर्वग्राही है। डेंगू में भेड़ का दूध पिलाया जाता रहा है। उस पर तो किसी ने एतराज नहीं किया कि यह दूध क्यों पिलाया जा रहा है?
आयुर्वेद के विशेषज्ञों की मदद से पतंजलि ने एक दवा क्या बना दी, कुछ लोगों ने हंगामा ही खड़ा कर दिया। गोली न बनाई हो जैसे बोफोर्स तोप बना दी हो और उस तोप का इस्तेमाल समस्त अंग्रेजी दवा साम्राज्य के खिलाफ होगा। साम्राज्य का प्रभाव भी देखिए, अपने ही देश में, मिनटों में मंत्रालय को उक्त दवा के प्रचार प्रसार पर प्रतिबंध लगाने पर बाध्य कर दिया।
एक दवा ही तो बनाई है, मानव कल्याण के लिए। कोई हथियार या चरस गांजा थोड़े बनाया है। 103 रुपए वाली गोली का तो कोई विरोध नहीं हुआ, क्योंकि वह एलोपैथी दवा थी?
आयुर्वेद का अपने घर में विरोध, इससे बुरा क्या होगा? अंग्रेजी दवा वालों ने उन खानदानी वैद्यों का तो आज तक विरोध नहीं किया जो शहर कस्बों में सडक़ों के किनारे तंबू लगाकर शर्तिया इलाज की दवा बेच रहे हैं।
यह दवा का विरोध है या बाबा का विरोध है, सब समझ से परे है। अंग्रेजी दवा गठबंधन ने आयुर्वेद को घर में घूसकर मारा है। उनकी एकता व हिम्मत की दाद देनी चाहिए। एक बात है, अगर अंग्रेजी वालों को खुद पर इतना भरोसा है तो दवाओं का 70 प्रतिशत कच्चा माल चीन से क्यंू मंगवा रहे हैं? लागत मूल्य से 500-500 गुणा अधिक मूल्य तक दवा क्यों बेच रहे हैं?
मनोज प्रभाकर, रोहतक -------------
आयुर्वेद का जनक भारत। बावजूद इसके आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल पर इतनी जबरदस्त सर्जिकल स्ट्राइक हुई है कि आचार्य बालकृष्ण को प्रेस कांफ्रेंस में हाथ जोडक़र कहना पड़ा कि उन्होंने कोरोना की कोई दवा नहीं बनाई। आयुर्वेदिक दवा जरूर बनाई है जिससे कोरोना के मरीज ठीक हुए हैं।
दवा का नाम कोरोनिल हो या कोरोनावटी, है तो कोरोना की दवा ही। इसमें इधर-उधर की बात करने से क्या फायदा। उनको अपनी बात पर अडिग रहना चाहिए था कि हां, उन्होंने जयपुर की मेडिकल यूनिवर्सिटी से मिलकर कोरोना की दवा बनाई है। अब किसी को खानी है तो खाइये, जबरदस्ती थोड़ा है। किसी को असर हो, किसी को ना हो। ये कोई जरूरी थोड़े है पैरासीटामोल से सभी का बुखार उतर जाता हो।
कोई भी डाक्टर या दवा किसी मरीज को ठीक करने की गारंटी नहीं देते। डाक्टर व दवा अपना-अपना प्रयास करते हैं। ठीक तो मरीज को स्वयं होना होता है। यह नीति कोई कोरोना के मरीज पर लागू नहीं होती बल्कि हर प्रकार के मरीज पर लागू होती है।
बाजार में खांसी की अनेक प्रकार की दवाइयां बिक रही हैं। अनेक कंपनियां बना रही हैं। किसी को कोई दवा असर कर जाए तो किसी को कोई दवा असर न करे। इसमें दवा की गलती थोड़े है। यह तो रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर करता है।
तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा ये सब जड़ी बूटियां हैं। इनको खा भी लिया जाए तो क्या आसमान टूट जाएगा। इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। एक बार आजमा कर देख लिया जाए तो क्या आफत है। देश में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री भी तो आजमाकर देखे जाते रहे हैं।
आयुर्वेद तो वैसे भी कुदरत का तोहफा है, सर्वग्राही है। डेंगू में भेड़ का दूध पिलाया जाता रहा है। उस पर तो किसी ने एतराज नहीं किया कि यह दूध क्यों पिलाया जा रहा है?
आयुर्वेद के विशेषज्ञों की मदद से पतंजलि ने एक दवा क्या बना दी, कुछ लोगों ने हंगामा ही खड़ा कर दिया। गोली न बनाई हो जैसे बोफोर्स तोप बना दी हो और उस तोप का इस्तेमाल समस्त अंग्रेजी दवा साम्राज्य के खिलाफ होगा। साम्राज्य का प्रभाव भी देखिए, अपने ही देश में, मिनटों में मंत्रालय को उक्त दवा के प्रचार प्रसार पर प्रतिबंध लगाने पर बाध्य कर दिया।
एक दवा ही तो बनाई है, मानव कल्याण के लिए। कोई हथियार या चरस गांजा थोड़े बनाया है। 103 रुपए वाली गोली का तो कोई विरोध नहीं हुआ, क्योंकि वह एलोपैथी दवा थी?
आयुर्वेद का अपने घर में विरोध, इससे बुरा क्या होगा? अंग्रेजी दवा वालों ने उन खानदानी वैद्यों का तो आज तक विरोध नहीं किया जो शहर कस्बों में सडक़ों के किनारे तंबू लगाकर शर्तिया इलाज की दवा बेच रहे हैं।
यह दवा का विरोध है या बाबा का विरोध है, सब समझ से परे है। अंग्रेजी दवा गठबंधन ने आयुर्वेद को घर में घूसकर मारा है। उनकी एकता व हिम्मत की दाद देनी चाहिए। एक बात है, अगर अंग्रेजी वालों को खुद पर इतना भरोसा है तो दवाओं का 70 प्रतिशत कच्चा माल चीन से क्यंू मंगवा रहे हैं? लागत मूल्य से 500-500 गुणा अधिक मूल्य तक दवा क्यों बेच रहे हैं?
मनोज प्रभाकर, रोहतक -------------
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