संदेश

चाऊमिन का बहिष्कार

चाऊमिन का बहिष्कार  लॉकडाऊन के चलते फास्टफूड पर महामंदी का असर दुकानों से निकलकर सडक़ों पर दिखाई देने लगा है। देर रात शहर के मशहूर फास्ट फूड कार्नर में शटर डाऊन कर एक आपात बैठक का आयोजन किया गया। बैठक की अध्यक्षता समोसे महाराज ने की।   बैठक में पिज्जा, बर्गर, इडली, सांभर, डोसा, टिक्की, गोलगप्पे, भटूरा, चाऊमिन व पैकेटबंद रसगुल्लों ने शिरकत की। बैठक में भविष्य को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की जानी थी, क्योंकि मंदी को लेकर सभी दुखी थे। कहने सुनने को बहुत कुछ था। पर समझ नहीं पा रहे थे कि वे अपनी फ्रस्टेशन का टोकरा किसके सिर  पर उड़ेलें। न तो चटोरे उपभोक्ताओं की कंजूसी पर शक किया जा सकता है और न सरकार की खामी नज़र आ रही है।   बैठक में मूल विषय पर चर्चा करने से पूर्व चाऊमिन की उपस्थिति पर सभी ने कड़ी आपत्ति जता डाली। अधिकांश सम्मानित सदस्यों ने तीखे अंदाज में कहा कि चाऊमिन चाइनिज है। वैश्विक स्तर पर चाइना का विरोध हो रहा है इसलिए इसका पूर्ण बहिष्कार किया जाए। कुछ सदस्यों ने चाऊमिन पर उपभोक्ताओं के साथ अभद्रता से पेश आने के आरोप लगाए तो कुछ ने इसकी शुद्धता पर अनेक सवाल कर ड...

सब्र का बांध

व्यंग्य सब्र का बांध लॉकडाऊन, आम जनमानस के सब्र का इम्तिहान। सब्र का यह बांध एक हफ्ते बाद हांफने लगा था। मैं गांव की सडक़ पर थोड़ा टहलने निकला ही था तो सामने से छबीला आ रहा था। देखा उसके पीछे-पीछे उसकी घरवाली भी आ रही है, वह रो रही थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए मेरी हिम्मत नहीं हुई कि छबीले से पूछ लिया जाए कि आखिर माजरा क्या है?   उनके जाने के बाद मैंने वहीं के एक व्यक्ति से पूछा कि भाई क्या हुआ? सब खैरियत तो है।   उसने बताया सब ठीक है।   -तो फिर यह छबीले की बहू रो क्यों रही थी?   उसने बताया कि अपने खसम से परेशान होकर मायके जाने के लिए बस अड्डे पर गई थी। तीन घंटे बैठी रही, कोई बस या अन्य वाहन नहीं मिला। तब तक छबीला उस तक जा पहुंंचा और जबरन घर ले आया। बस इतनी सी राम कहानी है। मैं समझ गया था यह लॉकडाऊन का प्रतिकूल प्रभाव है।   घर छोटा हो बड़ा। आदमी लगातार घर पर रहे तो पंगा ही पंगा है। आमदनी धेले की ना हो तो महापंगा। कोरोना की वजह से रहे लॉकडाऊन में कमोबेश यह बहुतों की समस्या मालूम पड़ी। सैंसेक्स बेशक धड़ाम से नीचे गिरा लेकिन घरेलू कलहों का ग्राफ एकाएक उछाल...

नमस्ते ट्रंप और ‘उनकी’ प्रेम वार्ता

व्यंग्य  डोनाल्ड ट्रंप अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ गांधी की भूमि अहमदाबाद पहुंचे। उनकी सुरक्षा के लिए भारी-भरकम अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों का काफिला था। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां तो उनके आस-पास नजऱ नहीं आई जबकि प्रधानमंत्री मोदी उनके संग-संग रहे। ऐसा लगा जैसे ट्रंप को भारतीय सुरक्षा बंदोबस्त पर कम भरोसा था। दोस्ती में तो अंधविश्वास व समर्पण भाव होता है। ट्रंप की सुरक्षा कंपनी में कुछ खास किस्म के खोजी कुत्ते भी आए थे, उनमें एक ‘एलिन’ नामक कुतिया भी थी। बिलकुल गोरी। न ज्यादा मोटी, और न ज्यादा पतली, पूरी चौकस थी। उसके छरहरे बदन पर सुनहरे बाल थे। आंखें ऐसी, जैसे नीले रंग के दो कंचे हों। लंबी व मोटी पूंछ ऐसे डोल रही थी मानो उसका सीधा संबंध व्हाइट हाऊस के कंट्रोल आफिस से हो। गले में ब्लैक कलर की पट्टी उसकी खुबसूरती को चार चांद लगा रही थी। कमाल की बात यह है कि वह किसी रस्सी से नहीं बंधी थी। यानि किसी अमेरिकन कर्मचारी के हाथों में उसकी लगाम नहीं थी। वह स्वच्छंद थी। उसकी अनुशासनात्मक स्वछंदता उसे और आकर्षक बनाने पर तुली थी। उसका चलना, सूंघना और देखना सब संयमित था। श्रीमान ट्रम्प जब प्रधान...