सब्र का बांध
व्यंग्य
सब्र का बांध
लॉकडाऊन, आम जनमानस के सब्र का इम्तिहान। सब्र का यह बांध एक हफ्ते बाद हांफने लगा था। मैं गांव की सडक़ पर थोड़ा टहलने निकला ही था तो सामने से छबीला आ रहा था। देखा उसके पीछे-पीछे उसकी घरवाली भी आ रही है, वह रो रही थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए मेरी हिम्मत नहीं हुई कि छबीले से पूछ लिया जाए कि आखिर माजरा क्या है?
उनके जाने के बाद मैंने वहीं के एक व्यक्ति से पूछा कि भाई क्या हुआ? सब खैरियत तो है।
उसने बताया सब ठीक है।
-तो फिर यह छबीले की बहू रो क्यों रही थी?
उसने बताया कि अपने खसम से परेशान होकर मायके जाने के लिए बस अड्डे पर गई थी। तीन घंटे बैठी रही, कोई बस या अन्य वाहन नहीं मिला। तब तक छबीला उस तक जा पहुंंचा और जबरन घर ले आया। बस इतनी सी राम कहानी है। मैं समझ गया था यह लॉकडाऊन का प्रतिकूल प्रभाव है।
घर छोटा हो बड़ा। आदमी लगातार घर पर रहे तो पंगा ही पंगा है। आमदनी धेले की ना हो तो महापंगा। कोरोना की वजह से रहे लॉकडाऊन में कमोबेश यह बहुतों की समस्या मालूम पड़ी। सैंसेक्स बेशक धड़ाम से नीचे गिरा लेकिन घरेलू कलहों का ग्राफ एकाएक उछाल खा गया। अब मोदी जी क्या जाने गृह कलेश की क्या परिभाषा होती है। यह बात और है कि वो पूरे देश को अपना परिवार मानते हैं। मगर सत्य तो यह भी है कि मानने व भुगतने में दिन-रात का अंतर होता है।
मैं छबीले के घर गया। उन्हें समझाने ताकि घर पर रहकर लॉकडाऊन का समय शांतिपूर्वक व्यतीत किया जाए। दूर से उनको आवाज़ लगाई और कहा कि भाई शांति बनाकर रखो। समय ठीक नहीं है। अगर तुम लोग ऐसा करोगे तो और समस्याएं खड़ी हो जाएंगी।
छबीले ने बताया, भाई काम धंधे तो बंद पड़े हैं। ठीक है सरकार ने फ्री में अनाज तो दिया लेकिन अनाज के अलावा और भी तो बहुत सारे खर्च होते हैं। परेशानी तो है, और इस परेशानी में लठ ही बजेगा, बीन तो बजेगी नहीं। टाइम पास करने के लिए बाहर जाएं तो पुलिस पीटती है और अंदर रहें तो यह भागवान रोटी वाला चिमटा दिखाती है। जान आफत में आ गई।
मैंने कहा भाई सब्र करो, सब्र। बोल बतलाकर टाइम पास करो। सब ठीक हो जाएगा। मैंने उनके छोटे भाई के बारे में पूछा जो चारपाई पर खर्राटे भर रहा था। छबीले ने बताया, यह भी आज पुलिस वालों से पिटकर आया है। टांगों पर व चुतड़ों पर डंडों के निशान पड़े हैं।
मैंने कहा- भाई साहब तुम सब उल्टे काम क्यों कर रहे हो। घर पर क्यूं नहीं बैठते। तुमको पता नहीं कितना भयंकर रोग आया हुआ है। एक बार लग गया तो पूरा गांव मुसीबत में पड़ जाएगा।
छबीले ने कहा- मैंने भी इस हरामखोर को समझाया था कि मत जा कहीं पर। पर नहीं माना। बोला- ये लॉकडाऊन क्या होता है। देखने के लिए जा रहा हूं। बोला, सुनते-सुनते बहुत दिन हो गए पर आज तक देखा नहीं। कैसा होता है ये। कोई मशीन है, जानवर है, या कोई आंधी तूफान या कोई और बला है। कहने लगा, जो चीज नई आई हो उसे देखना तो चाहिए। क्या पता कब काम पड़ जाए। और नहीं तो जनरल नॉलेज तो होनी ही चाहिए।
छबीले ने बताया भाई घरवाली ने क्लेश कर रखा है। कह रही है-गोलगप्पे खाने हैं चाहे कहीं से लेकर आ। मैंने समझाया भागवान सब्र रख, इस करोना को निकल जाने दे। फिर चाहे बीकानेर की दुकान पर चल पडिय़ो। आज वह बोली- सब्र की भी कोई हद होती है।
सब्र का बांध
लॉकडाऊन, आम जनमानस के सब्र का इम्तिहान। सब्र का यह बांध एक हफ्ते बाद हांफने लगा था। मैं गांव की सडक़ पर थोड़ा टहलने निकला ही था तो सामने से छबीला आ रहा था। देखा उसके पीछे-पीछे उसकी घरवाली भी आ रही है, वह रो रही थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए मेरी हिम्मत नहीं हुई कि छबीले से पूछ लिया जाए कि आखिर माजरा क्या है?
उनके जाने के बाद मैंने वहीं के एक व्यक्ति से पूछा कि भाई क्या हुआ? सब खैरियत तो है।
उसने बताया सब ठीक है।
-तो फिर यह छबीले की बहू रो क्यों रही थी?
उसने बताया कि अपने खसम से परेशान होकर मायके जाने के लिए बस अड्डे पर गई थी। तीन घंटे बैठी रही, कोई बस या अन्य वाहन नहीं मिला। तब तक छबीला उस तक जा पहुंंचा और जबरन घर ले आया। बस इतनी सी राम कहानी है। मैं समझ गया था यह लॉकडाऊन का प्रतिकूल प्रभाव है।
घर छोटा हो बड़ा। आदमी लगातार घर पर रहे तो पंगा ही पंगा है। आमदनी धेले की ना हो तो महापंगा। कोरोना की वजह से रहे लॉकडाऊन में कमोबेश यह बहुतों की समस्या मालूम पड़ी। सैंसेक्स बेशक धड़ाम से नीचे गिरा लेकिन घरेलू कलहों का ग्राफ एकाएक उछाल खा गया। अब मोदी जी क्या जाने गृह कलेश की क्या परिभाषा होती है। यह बात और है कि वो पूरे देश को अपना परिवार मानते हैं। मगर सत्य तो यह भी है कि मानने व भुगतने में दिन-रात का अंतर होता है।
मैं छबीले के घर गया। उन्हें समझाने ताकि घर पर रहकर लॉकडाऊन का समय शांतिपूर्वक व्यतीत किया जाए। दूर से उनको आवाज़ लगाई और कहा कि भाई शांति बनाकर रखो। समय ठीक नहीं है। अगर तुम लोग ऐसा करोगे तो और समस्याएं खड़ी हो जाएंगी।
छबीले ने बताया, भाई काम धंधे तो बंद पड़े हैं। ठीक है सरकार ने फ्री में अनाज तो दिया लेकिन अनाज के अलावा और भी तो बहुत सारे खर्च होते हैं। परेशानी तो है, और इस परेशानी में लठ ही बजेगा, बीन तो बजेगी नहीं। टाइम पास करने के लिए बाहर जाएं तो पुलिस पीटती है और अंदर रहें तो यह भागवान रोटी वाला चिमटा दिखाती है। जान आफत में आ गई।
मैंने कहा भाई सब्र करो, सब्र। बोल बतलाकर टाइम पास करो। सब ठीक हो जाएगा। मैंने उनके छोटे भाई के बारे में पूछा जो चारपाई पर खर्राटे भर रहा था। छबीले ने बताया, यह भी आज पुलिस वालों से पिटकर आया है। टांगों पर व चुतड़ों पर डंडों के निशान पड़े हैं।
मैंने कहा- भाई साहब तुम सब उल्टे काम क्यों कर रहे हो। घर पर क्यूं नहीं बैठते। तुमको पता नहीं कितना भयंकर रोग आया हुआ है। एक बार लग गया तो पूरा गांव मुसीबत में पड़ जाएगा।
छबीले ने कहा- मैंने भी इस हरामखोर को समझाया था कि मत जा कहीं पर। पर नहीं माना। बोला- ये लॉकडाऊन क्या होता है। देखने के लिए जा रहा हूं। बोला, सुनते-सुनते बहुत दिन हो गए पर आज तक देखा नहीं। कैसा होता है ये। कोई मशीन है, जानवर है, या कोई आंधी तूफान या कोई और बला है। कहने लगा, जो चीज नई आई हो उसे देखना तो चाहिए। क्या पता कब काम पड़ जाए। और नहीं तो जनरल नॉलेज तो होनी ही चाहिए।
छबीले ने बताया भाई घरवाली ने क्लेश कर रखा है। कह रही है-गोलगप्पे खाने हैं चाहे कहीं से लेकर आ। मैंने समझाया भागवान सब्र रख, इस करोना को निकल जाने दे। फिर चाहे बीकानेर की दुकान पर चल पडिय़ो। आज वह बोली- सब्र की भी कोई हद होती है।
--मनोज प्रभाकर, वरिष्ठ पत्रकार
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